Result of Poetry Competition Third Edition
Category: Hindi

Title: अभिमन्यू
 

यह गाथा है कुरूक्षेत्र के पावन धरती की...

धैर्य शौर्य कर्तव्य धर्म यश अमर किर्ती की...

 

महाभारत का तेरहवा दिन, अर्जुन को‌ कुरूक्षेत्र से दूर रखा...

महायोद्धा को मारने खातिर, चक्रव्यूह द्रोण ने घनघोर रचा...

 

चक्रव्यूह भेदन की कला, एक ही वीर को ध्यात थी...

बाहर आने की कहानी, अभिमन्यू को अध्यात थी...

 

यह गाथा है गुरूकुल के तेजस्वी सूर्य की, पार्थपुत्र के अमर शौर्य की...

पिता का कर्म जिसने अपना धर्म बनाया, यह गाथा है उस कर्तव्य की...

 

कौरवो के महारथियों संग, एक अभिमन्यू ने युद्ध किया...

चक्रधर का भांजा है वह, चक्रव्यूह भेदकर सिद्ध किया...

 

द्रोण कर्ण का मान भेदा, और शकुनी का अभिमान भेदा...

दुर्योधन का वस्त्रहरण कर, मां द्रौपदी का अपमान भेदा...

 

पांडवो का शिष ऊंचा करके, जो पार्थिव धरा पर गिर पडा...

काल का स्वागत प्रसन्नता से कर, अभिमन्यू ठहरा वीर बडा...

 

स्वर्ग की नयी परीभाषा लिखती, ये शौर्य की रवानी है...

जिंदगी जीने की नहीं, सार्थकता से मरने की कहानी है...

 

ना ही अर्जून सर्वश्रेष्ठ रहा, ना ही कर्ण सर्वश्रेष्ठ रहा...

कर्तव्य खातिर बलिदान हुआ, वह कर्म सर्वश्रेष्ठ रहा...

 

हार जीत होती रही है सदा, तीर और तलवार की ...

कहानी शाश्वत रहेगी सदा, साहस के ललकार की ...

Winner

आशिष देशमुख

Link : www.instagram.com/kagaj.syahi.kalam

More details are HERE.

Link : instagram.com/she_the_hyperactive

More details are here

Title: गणिकागृह  

    मेरी काली कालिख कहलाए 

    तेरा काला तिल

    मेरी कालिख से लगे कलंक 

    तेरे से हुस्न ढहाए ।।

    तू पहने श्वेत वस्त्र तो योगिन कहलाए 

    मै पहनूँ धवल 

    तो जीवन ही श्वेत नज़र आए।।

    तुम देखो तो इन्द्रधनुष 

    मै देखूँ तो श्वेत जीवन मेँ 

    सतरंगी पट्टी नज़र आए 

    ये कैसी विडम्बना 

    ये कैसा अनाचार

   रंगों का रँग समान पर

   अर्थ बदल जाए।।

   इस श्वेत श्याम के माया में 

   बंधी है सारी काया

   खुली आँखो से उज़ली

   और बन्द में केवल छाया ।।
 

    तुम देह बनो या बनो परछाई 

    दोनो ने ही साथ निभाई 

    मै तुमसे और तुम मुझसे 

    कब किसे ये समझ में आई।।

    तुम पहनो आभूषण 

    सजकर निकलो तो इज्जत पाओ

    तुम पहनो तो पायल 

    हम पहने तो घुंघरू कहकर 

    शोर मचाओ ।।
 

    तेरे घर की दीवारों में बजे ध्वनि संगीत बनकर

    मेरे घर की राग बदल पैरों की ताल बन जाए

     है व्यर्थ बडी ये सोच सारी 

    जीवन खुद संशय में 

   और कहलाए  जटिल नारी ।।

    पुरुषार्थ दिखे तुझे पौरुष में 

    पर मै देखूँ तो स्वार्थ भरी निंदा में समाए 

    जो दिखादूँ समाज को मै आईना

    घरों के सारे दर्पण टूट जाए।।

    तेरे घर के आंगन में दीप जलाने 

    हमने गणिकागृह बनवाये 

    घर घर ना हो कसाईखाना

    गली के कोनो में कसबीखाना नज़र आए 

    रहे सलामत तेरा आलय 

    फिर चाहे कोई इमारत 

     वैश्यालय कहलाए।।

Runner up

Shubhra Bagchi

Link : instagram.com/bagchishubhra

More details are HERE.

Link to Writer : instagram.com/divyanshiissss

More details are here

Top 10 Poets (inclusive of winners)

Title: भेदभाव क्यों

भेद क्यों रंगों में करता श्याम खुद है सांवले

फिर भी सारा जग है पूजे दुख में सारे नाम ले

 

भेद क्यों जाति में करता क्या तुम न माने राम को

शबरी के झूठे बेर खाए भेजा अपने धाम को 

 

भेद क्यों वस्त्रों में करता देख शिव भगवान को 

भस्म रमाए बैठे हैं सृष्टि के कल्याण को

 

भेद क्यों नर नारी का है सीता से बने सीताराम 

राधा नाम पहले आता जब भी बोलो राधेश्याम 

 

 भेद क्यों धन से है करता देख विप्र गरीब सुदामा

थे निरीह निर्धन फिर भी कृष्ण ने था हाथ थामा

 

भेद कहां वायु है करती सबको ऑक्सीजन देने में 

भेद कहां सूरज है करते रोशनी की किरण देने में 

 

भेद कहां सागर है करता नदी मिले या मिले नाला 

भेद कब उसने किया है सबका है वह ऊपर वाला 

 

फिर आखिर कौन है हम तुम जो किसी को नीचा दिखलाएं 

प्रेम बाटे प्रेम से रहें प्रेम से सबको गले लगाए

 

भेद सारे मिट जाएं बस एक भेद हो कर्म का 

धर्म की जयकार हो और नाश हो अधर्म का

Poet: शिवमंगल पंड्या

Title: आक्रोश

 

आओ काट दें, उन हाथों को  

जो औरत की अस्मिता पर उठते हैं।

और उन ज़ुबानों को भी 

जो दुष्टों के, जीने की वकालत करते हैं।

 

काटें हम उन  बेड़ियों को 

जो इस दुर्गति तक हमें पहुँचाते हैं 

जन्म दे सकते इन कापुरुषों को,

तो क्या प्राण नहीं हर सकते हैं???

 

जो लज्जा को बताते, स्त्री का आभूषण

वो ही करते उसका वस्त्र-हरण!

सभा में एक नहीं, हैं कई दुर्योधन 

बेदाग नहीं, हों भीष्म या कर्ण।

 

है कोई सिंहासन को समर्पित, 

तो बन ढाल, कोई मित्र को अर्पित।

कोई हार पत्नी को  सर झुकाता है 

तो कोई भ्रातृ-प्रेम में बोल नहीं पाता है-

 

बस नहीं कोई समर्पण, तो उस समर्पित को

जिसने जीवन-रस से तुम्हें सींचा है

जब देखो तब किसी दुःशासन ने 

उसकी साड़ी को खींचा है।

 

आओ नया इतिहास लिखें 

और नई महाभारत गाथा,

जहाँ झुके ना सभ्यता का सिर 

और ना भीष्म-द्रौपदी का माथा ।

 

दो चपत लगाएँ दुर्योधन को

तात् भीष्म और गांधारी माता

आँख पर पट्टी बांध लेने से 

सच , झूठ नहीं हो जाता।

 

गुरु ने भी ग़र लगाई होती फटकार 

तो क्या दुर्योधन कर पाता, मर्यादा पार?

बड़े भाई जो ना बनते मूक-बधिर 

दंड देते,जो होता दुःशासन अधीर

 

क्या माएँ नहीं बनतीं अब वो?

जो अपने हाथों सज़ा दें, स्वजन्मे को 

ग़र वो  कुकर्मी बन जाता है 

माँ के दूध को लजाता है।

 

आओ काट दें, उन हाथों को 

जो औरत की अस्मिता पर उठते हैं।

और उन ज़ुबानों को भी 

जो दुष्टों के, जीने की वकालत करते हैं।

Poet: रीचा सिंह 

Titleमेरा आदर्श

मैं जानता हूं उदारता के संबंधी को

वह निरा निस्वार्थ है, निष्पक्षता के संधि को

मनन्तर्विरोध में भी निर्विरोध है वो

नास्तिक भी है मगर 

मेरी आस्था की पगडंडी है वो

भले मिले हम हैं कम, मगर इतना जानता हूं

इंसानी चरित्र की परिभाषा है वो

 

माना हर सवाल का नहीं, मेरा जवाब है वो

यूं तो हीरा है सभी का, मेरे लिए नायाब है वो

स्वावलंबन और परोपकार की धार में

सतत व्यक्तित्व की पतवार है वो

ढल रही धूमिल शाम नैतिकता की जो

उसका रोशन महताब है वो

 

वह कर्त्तव्यपरायणता और आदर्शवादिता की पीढ़ी है

वह दृढ़ इच्छाशक्ति और यथार्थता की सीढ़ी है

हैं वो बुद्धिजीवी और कर्मशील भी

वो है सार्वभौमिक और सहनशील भी

 

संयम को बना सारथी, चित्त में विवेक की लौ

मस्तक पर अभिषेक तर्क का, लिए विज्ञान की सौं

हो सवार परिवर्तन रथ पर, बोने वैचारिक जौ

सुनिश्चित है जीत उनकी, लौटेंगे फहरा विजय पताका को

 

संकेत है भावी प्रहार के, कदम भर खींचे जो दो

बढ़ रहे जीतने धर्मयुद्ध प्रबुद्ध, कैसे निपटेगा ग्रह युद्ध

 

निस्वार्थ यज्ञ के संकल्प हेतु, स्वार्थ की धूंनी चाहिए हुक्मरानों की अनदेखी कर, ज़रा अनुपालन की आहुति चाहिए 

 

संबंधों को कर लचीला, गीता की वो स्मृति चाहिए

बने बुद्ध प्रबुद्ध जिस रात, वो पूर्णमासी रात चाहिए 

 

उसे सूरज की तरह तपना भी आता है 

उसे फूलों की तरह महकना भी आता है

यहां चार-पांच डिग्री में आंतें सिकुड़ जाती हैं

उसे -40 डिग्री में भी कमान करना आता है

Poet: Mohit Yadav

Title: कवि की परिभाषा

है लेखनी हाथ में लेकर बैठे
और आँखों में निराशा है
जो जिंदगी उतार दे पन्नों पर
वो सच्चे कवि की परिभाषा है

है गुजर गए जो उनके साथ
कर्तव्य की एक कहानी है
है निकल रहे उन आँखों से
दो बूंद खून सा पानी है 

तू समझ नहीं उनको झूठा
ये जीवन  की एक छवि है
जो मौत को भी है मोक्ष कहें

वो ही एक सच्चा कवि है

लिखना है कोई कला नहीं
मनभाव तुम्हारा अच्छा हो
कर्तव्य सिखायें हम सब को
बस चरित्र खुद का सच्चा हो

है लेते शपथ हम सब मिलकर
लिख कर हम फर्ज निभाएंगे
है लिपट रही जो कफन में बेटी

उनको इंसाफ दिलाएंगे

है आग दिलों में जल उठा
मन में उठती ये आशा है
जो मोक्ष को मानव कहें
वो सच्चे कवि की परिभाषा है

है गर्व मुझे अपने कलम पर
जो वक़्त को भी बदल देगा
जो लिवास कफन में लिपट रहे
उसे जिंदगी जीने का हक देगा।।।।


 

Poet: Deependra Kumar Jha

Title: काश वक़्त भी बूढ़ा होता।

काश वक़्त भी बूढ़ा होता,
उसकी चाल भी धीमी होती,
उसका भी एक दौर गुजरता,
जिसमे छवि यादों की गहरी होती,
अतीत शब्द के साये में उसके भी कुछ शौक समाते,
और वर्तमान शब्द के उजाले में उसका भी कुछ अधूरा होता,
काश वक़्त भी बूढ़ा होता।

काश वक़्त के सपने होते,
कल उसमें बदलाव हो जाता।
अस्थिरता का प्रकोप कभी तो वक़्त ने भी कुछ झेला होता।
फिर वह भी कभी कुछ इकट्ठा करता,
जिससे थोड़ा बहुत कुछ पूरा होता।
काश वक़्त भी बूढ़ा होता।

काश उसकी भी एक दुनिया होती,
उसके भी कुछ रिश्ते होते,
और संबंध का दर्पण निर्मम होता।
फिर रिश्तों में बस औपचारिकता रहती,
और उसपर भी फिर विराम सा लगता,
और दर्पण का बस चूरा होता।
काश वक़्त भी बूढ़ा होता।

काश उसकी कुछ इच्छाएँ होती,
उसके भी कुछ मन को भाता।
दौड़ भाग के चक्कर में,
कभी उसने भी कुछ छोड़ा होता।
काश वक़्त भी बूढ़ा होता।

काश उम्र के पड़ाव के कारण,
उसको कभी थकावट होती।
रुक जाने की इच्छा लेकर,
उसको भी सुस्ताना होता।
पर उसपर भी कुछ हावी होता,
चलना उसकी विवशता होती,
और विश्राम का वो आनन्द सुहाना,
उसके लिए बस थोड़ा होता।
काश वक़्त भी बूढ़ा होता।

Poet: पीयूष तिवारी

Title: अपूर्ण कविता

पुलकित, हर्षित 

पुल्ल प्रफुल्लित

वीणा सी कभी

झरने सी गुंजित

बहती नदी को

मैं लिख नही सकता

हाँ! तुम्हारी हँसी को

मैं लिख नही सकता

 

चंचल चित समर्पित मन

चंदन ही सा सुरभित तन

कुंचित केश निराले नैन

ज्योतिकलश से दो प्यारे नैन

उन नैनो की ज्योति को

मैं लिख नही सकता

तुम्हारे नैनो के मोती को

मैं लिख नही सकता

 

जलप्रपात की धारा जैसे

मोतियों की माला जैसे

उसके जैसा नही कहीं कोई 

वो तो है ध्रुव तारा जैसे

उस तारे की रोशनी को

मैं लिख नही सकता

हाँ ! मुख की चाँदनी को

मैं लिख नही सकता

 

भाव भंगिमा सूरत की

और सुंदरता सीरत की

आकृति मोम के मूरत सी

ताज़गी ब्रम्ह मुहूरत सी

उस अप्सरा, उस परी को

मैं लिख नही सकता

हाँ! तुम्हारी छवि को

मैं लिख नही सकता

 

संग रहे तो दूर रहे बुराई

जैसे टिका का काज़ल

वो सारे कष्ट मिटा देती है

बिल्कुल जैसे तुलसी जल

चौंरे की उस तुलसी को 

मैं लिख नही सकता

तुम्हारी मेरी संगति को

मैं लिख नही सकता

 

मैं जो भी लिखूंगा

अपूर्ण होगा

प्रेम का वर्णन 

नही पूर्ण होगा,

इसलिए

प्रेमपाती प्रेयसी को

मैं लिख नही सकता

तुम्हारे लिए कुछ भी तो

मैं लिख नही सकता

हाँ तुम वो कविता हो

जिसे मैं लिख नही सकता

कितना भी प्रयत्न कर लूँ

कभी मैं लिख नही सकता

एक कविता...

Poet: Tushar Bebarta

Title: दूरियाँ

तुम्हारे दोनों गालों को अपनी हथेली में रखकर
मैंने प्रेम को कई बार अपने समानान्तर देखा
प्रेम में करीब हो जाती हैं आत्माएँ
मैंने अधरों से स्पर्श किया था तुम्हारा ललाट

तुम अक्सर एक विस्तृत महासागर की तरह इठलाती
मैं किनारे सा स्थिर रहता तुम्हारी लहरों पर
तुम्हारे अलंकार से मैं कवि बना
मेरे शब्दों से तुम कविता बनी
मैंने तुम्हें अपनी किताब के सबसे सुन्दर पन्ने में रखा
मेरी किताब का सबसे सुन्दर भाग तुम हो

मैं जब भी देखता हूँ कुम्हार की चाक को
मुझे याद आता है मेरे वचनों का केन्द्र
मैं कच्चा था अपनी सम्भावनाओं से
वचनों की सार्थकता में तपकर मैं लाल हुआ
अब मैं घड़े से ज्यादा पका हूँ

मेरे सारे वचन तप्त हैं
तुम्हारी सारी प्रतीक्षाएं पवित्र हैं
तुम पवित्र होकर महासागर की गहराई बन गई
मैं तपकर पहाड़ बन गया
एकदिन आएगी तुम्हारे भीतर सुनामी
तुम मुझसे मिलोगी हमारी सारी दूरियाँ मिटाकर

या एक दिन मैं भूस्खलित हो जाऊँगा ।

Poet: शरद अल्फाज़ी 

Title: नई शुरुआत

कल जो हुआ उसको तू भूले 

फ़िक्र न कर कल क्या होगा l

नई लेखनी हाथ में थामें 

तू अपनी तकदीर लिखेगा ll

 

पसगैबत जो बातें करते 

वो न कभी आगे बढ़ते हैं l

तू जिस राह में चलने वाला 

कई पढ़ाव उसमें पड़ते हैं ll

 

मुनफरीद क्यों रहता तू 

वो जो तेरा साथ निभाता l

बुरा या अच्छा कहने वाला 

'वक़्त' नाम इसका कहलाता ll

 

नवजीवन जब शुरू करेगा 

तू जैसा शोला भड़केगा l

जो तुझको पागल कहलाता 

वो मरघट तक तड़पेगा ll

 

वो जो तेरी बात न करते 

उनसे अब तू ध्यान हटा ले l

नासाजों को बकने दे 

माथे से उनका भार घटा ले ll

 

तीर चलेंगे तुझपे अगणित 

तू खुद को दीवार बना ले l

मेहनत मरते दम तक करनी 

आदर्शों की दीदार बना ले ll

 

नहीद तेरे मन को सताए 

आग भी पानी में बह जाए l

इस दौर में मूलम्मा भी तो 

कड़ी मेहनत का फल बतालाए ll

 

मसला ऐसा कोई नहीं है 

जिसका कभी ना हल मिला हो l 

अस्तित्व नहीं ऐसे सवाल का 

जिसका न जवाब कल मिला हो ll

 

जो गया उसे छोड़ दे 

जो है उसको संभाल रखे l

होश- जोश के सरगम से 

तू जज्बाती सरताज लिखे ll

Poet: अवनीश बखले

Like us on Facebook to stay connected and follow us on Instagram