Result of Poetry Competition Second Edition
Category: Hindi

Title: रिक्तता

रिक्तता में शून्य की परिधि नहीं,
निःशब्द को भाव की समिति नहीं,
भक्ति मिलन को वांछनीय शक्ति नहीं,
शुद्ध-कृति को स्मृति नहीं विस्मृति नहीं।

मान को भय नहीं अपमान का, 
ज्ञान को भी श्रम नहीं प्रमाण का,
प्राण के अक्षत् आधार बिंदु को है-
नहीं अपेक्षित सत्य के परिमाण का।

सात्विक प्रेम की स्निग्धता को,
प्रयोजन नहीं महोत्सव का तो,
साधन को साध्य क्या !
साधना को पाथेय क्या !
वितर्क को रोष..
और तर्क बोध क्या !
अराधना को दैव क्या..
सृजन को संहार क्या !

न सजी है अपेक्षा की अट्टालिकाऐं..
न बनी हैं सोपान की श्रृंखलाएं ।
श्रद्धा की पराकाष्ठा को महत्वकांक्षा नहीं 
अभिव्यक्ति को भावों की आकांक्षा नहीं,
है नहीं संदेश कोई, प्रतीक्षा रत् परीक्षा नहीं। 
जिज्ञासा को प्रश्नों की समीक्षा भी नहीं।

बन समिधा अनंत हेतु समर्पण की, 
कांति पुंज के यज्ञ होम में तर्पण की
ज्वाला को बढ़ने दो।
है सूक्ष्म सी रेखा कहीं 
स्वाभिमान पर मान की अभी 
स्वार्थ को बन शलभ इस में जलने दो। 

रिक्त ता की धवलता को अविरल असीम की
बन ओज बूंद हो नि:शब्द - अनवरत छलकने दो।
मिलन के मौन आतुरता को शून्य से मत भरने दो।।

रिक्तता में शून्य की परिधि नहीं..
शून्य से मत भरने दो।।


 

Winner

कंचन

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Title: प्रियतमा

बन कर गीतों का तुम सरगम,

पत्तों पर बनकर तुम शबनम,

घटा सावनी सी खिलकर,

हृदय हवाओं का छू कर,

नीलकंठ सा विष पीकर,

सीपी में मोती सी  छुप कर,

बन कर ग़ज़लों का दर्द कभी,

बन कर नज़्मों का मर्म कभी,

कविताओं में छंद कभी,

वृक्षों की बनकर छाँव कभी,

जीवन का बनकर सार कभी,

फूलों का बनकर हार कभी,

बनकर कीचड़ का कमल कभी,

बनकर काँटों का फूल कभी,

सागर के मन का ज्वार कभी,

नदियों के तन का प्यार कभी,

प्रज्वलित दीपों का तेज कभी,

तपती किरणों का ओज कभी,

निर्बंध हवा का वेग कभी,

चिड़ियों की मीठी चहक कभी,

शशि की किरणों का स्नेह कभी,

अधरों पर खिली मुस्कान कभी,

मंथन की अमृत बूंद कभी,

उस ज्योति कलश की दीप्ति कभी,

बनकर जाड़े की भोर कभी,

बनकर गर्मी की शाम कभी,

बचपन का सहज स्वभाव कभी,

यौवन का सुदृढ़ भाव कभी,

उषा सी बनकर सौम्य कभी,

निशा सी बनकर मौन कभी,

बनकर क्षितिज का मान कभी,

बनकर अवनि का प्राण कभी,

एकाकी मन का धैर्य कभी,

विचलित मन में स्थैर्य कभी,

चपला जैसा ऐश्वर्य कभी,

तारों का है सौंदर्य कभी,

झीलों जैसा ठहराव कभी,

धाराओं सा है बहाव कभी,

बनकर मौसम का राग कभी,

मन का अविरल अनुराग कभी,

 

इंद्रधनुष सी सतरंगी,

भर कर नयनों में अरुणिमा,

प्रकृति का कोमल रूप लिए,

बन जाओ मेरी प्रियतमा!

Runner up

CBP SHRIVASTAVA

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Top 10 Poets (inclusive of winners)

Title: "राजनीती और जवान"

लाख कोशिशो से भी ना पहचान पा रहे थे वो लाश के चेहरे
कुछ रोने को तो कुछ पैसो के लिये थे वहाँ ठहरे
किसी का बेटा तो किसी का भाई गया
करके अपना काम वो कसाई गया
क्युं खड़े थे वो यूँ सरहद पर
गूँगी लाचार सरकार की मदद पर
अब सब लेटे है यहाँ कफन ओढ़ कर
झुठा दिलासा लिये भी है कुछ हाथ जोड़ कर
अब उनको यहाँ से ले जाया जायेगा
अन्दर रूह तक उनको जलाया जायेगा
राख नदी मे यूँ बहा हो जायेगी
दो दिन बाद ये खबर भी हवा हो जाएगी
पर इन खबरो से अखबार बड़ा हो जाएगा
और सरहद पर फिर कोई खड़ा हो जाएगा
कुछ पैसो से तो कुछ वादो से मनाएंगे
कुछ भीड़ की मोम्ब्बतीयाँ जलाएंगे

कुछ समाचारो मे इन्साफ इन्साफ चिल्लाएंगे

और कुछ दूसरो को पकड़ कर दोषी मनवायेंगे

पर कोई ना जायेगा उस जवान के घर पर
अकेली माँ रो रही होगी जहाँ दर पर
जब उसका खुद से पूछने को दिल चाहेगा
क्या बेटा मेरा वापस लौट कर आयेगा
बन्द कर बत्ती अब वो सो गया है
दिल उसका भी अब रो गया है
पढ़ कर भूल जाने वाली नही है ये कहानी
ये उनकी जिन्दगी है ये भी बात मैने मानी
पर क्या कहानी यही थी और यही रहने वाली है
कोई तो समझ ले कि उस उम्मीद के पीछे

ये दर्द कितना भारी है।

ये दर्द कितना भारी है।।

Poet: Deepak Andure

Title: तू आग बन, तू सूरज बन *

 

तू चांद है सूरज बन 

तू शरर है आग बन l

जीवन के संघर्षपूर्ण रण में 

तू जलती प्रखर मशाल बन ll

 

दुनिया झुकती है तेरे आगे 

तू झुकाने की हिम्मत रख l

हालातों के कांटों पर से 

चलने की तू ताकद रख ll

 

सुनाई देगा सब कुछ तुमको 

दिखाई देगा लक्ष्य सामने l

झुकना है तो मर जा 

कोई और लढे़गा इसी बहाने ll

 

तोहमत होगी तुझपे लेकिन 

गगन भेद परवाज रखना l

युद्ध का ऐलान करके 

बुलंद तेरी आवाज रखना ll

 

तगाफुल कर मुश्किलों को 

चढ़ते चढजा चोटी पर l

याद रखेगी दुनिया तुझको 

नाम लिखेगी मोती पर ll

 

दूसरे बढ़ते है बढने दे  

तुम पत्थर पर लिखी इबारत हो l

सफलता भी जलती है तुझपे 

तुम ही उसकी आदत हो ll

 

गागर में सागर भरते तुमको 

किस बात का डर सताता है l

कौन सा मंजर तोहरे मन में

तकलीफो का घर बनाता है ll

 

पानी पर से चलने वाले 

तपती आग से डरता है l

किसी गैर के कहने से 

अंधियारे में चलता है ll

 

आफताब है तू आग है तू 

मरते दम तक चमके तू l

जब भी नसीब परीक्षा ले 

गिरते उठते संभले तू ll

Poet: अवनीश बखले

न तो पहले मुकाम पर कायम हुं,

और न आखरी पायदान पर हुं।

टूटी हुई माला को वापिस पिरोए,

एक मनका हुं, मैं एक कविता हुं।।

 

अबोध सूखे कंठ की प्यास बनती,

हलक विद्वानों के प्राणों में भी बसती।

परमबोध की पावन गंगा बहाती ,

एक मीठी रसधार हुं, मैं एक कविता हुं।।

 

कही लघु तो कही दीर्घ हुं,

कही उजाड़ तो कही तीर्थ हुं।

कही अनकही तो कही अनसुनी,

एक फ़रियाद हुं, मैं एक कविता हुं।।

 

कभी जीवन के मर्म को समझाती,

कभी मृत्यु का राग अलापती।

पल-पल के संघर्ष को विलाप करती,

एक अविरल गाथा हुं, मैं एक कविता हुं।।

 

जमाने कई आकर गुजर गए मुझमें,

और कई सदियों का आना अभी शेष।

वक्त की सराय में रुका नन्हा सा,

एक लम्हा मुसाफिर हुं, मै एक कविता हुं।।

 

आंचल से अपने अंग को ढकती,

योवन देकर भी अपने अंश को पालती।

समंदर हो गई फिर भी दरिया को तरसती,

एक औरत हुं, मैं एक कविता हुं।।

 

छंदो से चहकती हुई सुरो में रस घोलती , 

जागती नींदों को लोरीया गाकर सुलाती।

अपने ज़ख्मों से लिखी किसी गज़ल का,

एक मतला हुं, मैं एक कविता हुं।।

 

बदलते मौसमों की कैनवास पर रंग भरती हुई,

कभी अगीया के अंडों में कसमसाती  हुई।

कही फूलों को खुशबूओं से भिगोती हुई,

एक शबनम की बूंद हुं, मैं एक कविता हुं।।

Poet: Nilesh Bhawsar 

Title: अन्तर्द्वन्द की पुकार


मंज़िल पाना है आसान- इतना है मुझे ज्ञान,

फिर क्यों लिया है खुद को नाकामयाब मान?


जब सफलता की ही करता है दिल हमेशा कामना ,

फिर क्यों नहीं कर पाती हूँ दुनिया का सामना?


हिम्मत और हौसले का ले कोई अगर सहयोग,

नहीं रहता वह फिर किसी भी चीज़ के अयोग्य।


फौलादी दम है बाजुओं में, नहीं कर पाती उसका उपयोग

दुबक जाती हूँ क्यों, जब करना हो कोई नया प्रयोग?


यक़ीनन कुदरत ने बनाया है मुझे कुछ ख़ास,

क्यों नहीं दिला पा रही मन को यह विश्वास?


चलने लगूं तो सारे फ़ासले खुद ब खुद मिट जाएं

यह जानते हुए भी क्यों मेरे कदम लड़खड़ाए?


जज़्बाती कमज़ोरी ने जब-जब है मुझे रोका,

अंतरात्मा ने मेरी तब-तब है खूब टोका।


लगा किसी वीरान कोने में ही मिलेगा अब आराम...

लेकिन अपराधबोध ने वहां भी कर दिया जीना हराम!


चाहकर भी आगे बढ़ने से झिझकती रही;

अपनी इसी नाकामी पर हमेशा सिसकती रही!


ऐ खुदा! सुन ले इस दिल की पुकार

जगा दे तू, मुझ में जुनून बेशुमार!


भर दे दिल में तू, जोश और लगन!

कभी न बुझे, मेरे उमंगों की अगन!


मेमने बने इस शेर को करने दे दहाड़

बना दे मुझे अपनी शक्ति का पहाड़! 


आसमान की बुलंदियों को, छूने को है मन परेशान...

बेड़ियां तोड़ सारी अब, भरनी है ऊंची उड़ान!

Poet: Priyanka Tiwari

Title: मैं लड़का हूँ 

मैं लड़का हूँ, मुझे टूटने की इजाज़त नहीं,
लिखूँ जिस पर अपने जज़्बात, ऐसा कोई कागज़ नहीं। 

कुछ बोलूँ तो सुनोगे क्या ?
सुनकर, नामर्द है तू ऐसा कहोगे क्या ?

अँधेरे में मुझे भी डर लगता है,
भीड़ में मुझे थामे कोई, मन मेरा भी करता है। 

जिम्मेदारियों के बोझ से टुकड़ों में बट जाता हूँ, 
घड़ी से भी तेज चलता हूँ, फिर भी निकम्मा कहलाता हूँ। 

सबकी दस सुनने में कोई हर्ज़ नहीं, बस अपनी एक सुनाना चाहता हूँ, 
बिलख कर बहाने हैं वो आँसू, जो हर दिन आँखों में छुपाता हूँ।  

तुम्हारे लिए गेट खोल नहीं पाता, गाड़ी ढंग से चला नहीं पाता,
पर तुम बताओ, यह सब होता क्या तभी मर्द कहलाता ?

बहुत जल्दी बड़ा हुआ हूँ मैं, मुझे ठहरने की फुर्सत दो,
ज्यादा नहीं मांगता तुमसे, बस मेरी मुझसे कुर्बत हो। 

हो सकता है हरकतों से बच्चा हूँ, जिम्मेदारियों में कच्चा हूँ,  
पर इंसानियत है मुझमे, किरदार से अपने सच्चा हूँ। 

जो किरदार मैं निभा रहा हूँ, कोई चार दिन भी निभाए तो,
फूट के मैं भी रो दूंगा,
मर्द को भी दर्द हो सकता है, ऐसा कोई बताये तो।

Poet: सागर गोयल  

खाली जेब में पेट भरा बता के खाने को नकारा था

मुफलिसी में मैंने ऐसा दिन भी गुजारा था

 

अपने रखते द्वेष पराये करते कलेश

हर तरफ समस्याओं का पिटारा था

आज की गर्दिशें कल करूंगा शब्दो में पेश

बस इसी उम्मीद में बचपन को संवारा था

 

ना जलाया दीया दिवाली में

ना लगाया रंग होली में

मेलों में भी तन्हा रहा

नहीं पडा था एक भी हसीं पल मेरी झोली में

डूबती कश्ती का मेरी ना कोई किनारा था

मुफलिसी में मैंने ऐसा दिन भी गुजारा था


 

जर्जर छतो को बरसात के डर ने घेरा

फूटने लगी थी हर कोनो की दरारें

नीचा भी पड़ गया मकान मेरा

ऊंची होगयी पड़ोस की दीवारें

मैं अपने हक की धूप छांव हवा तक हारा था

मुफलिसी में मैंने ऐसा दिन भी गुजारा था

 

निहत्था लडा इन पीड़ाओं से

बस मेरी किताबे मेरे साथ थी

बना दिया मुझे मुकद्दर का सिकंदर

इन पन्नो में वो बात थी

ना था साथ किसी का, मुझे तो बस मेरा ही सहारा था

मुफलिसी से फिर भी मैंने, अपने घर को पार उतारा था

Poet: Deepak Sharma

Title: दिल की बेजूबान दास्तान

रात में ख्वाबों में, दिन में खयालों में बसते हो‌..

मुलाकात होने पर हमें नजरअंदाज कर देते हो..

 

हमारी जिंदगी की एक अकेली ख्वाईश और राज़ हो तुम..

मुसल्सल सिलसिला, सुहाना अफसाना, खुफीया किस्सा हो तुम..

 

जज़्बात हमारे तुम्हारे लिये कभी बया नहीं कर पाएंगे..

तुम्हारा सामना करने की हिम्मत हम जुटा नहीं पाएंगे..

 

हमारा मिलन होना, हमारी मुकद्दर मे लिखा नहीं है..

इस खयाल के ज़ेहन में आने पर रूह तडप उठती है..

 

शिकायत तुमसे नही, खफा तो हम खुद से बैठे है..

हासिल नही होगी फिर भी मोहब्बत की जुर्रत कर बैठे है..

 

इस दिल्लगी का कोई मुकाम नहीं, मालूम है हमे..

किसी और के हो जाओगे, तो भी भुला नहीं पाएंगे तुम्हे..

 

कुछ कमियां, कुछ खामियां, हम में तुम्हे हुई मेहसूस..

तुम्हारे खातिर खुद को बदल नहीं पाएंगे, इसका रहेगा अफसोस..

 

तुमसे दूरी बनाये रख कर, तुम्हारा दीदार कर लेंगे हम..

गलती हमारी है उसका खामियाजा भी भूगत लेंगे हम..

 

किसी दिन एक दफा तुम्हारे दिल के दरवाजे पर दस्तक देंगे..

तुम नामंजुरी दिखाओगे, तो थोडे़से मायूस जरूर होंगे..

 

एक वादा है तुमसे तुम्हारे निकाह में शरीख होंगे हम..

खुशीसे एक प्यारासा नजराना जरूर पेश करेंगे हम..

Poet: Sakshi Milan Khedekar

Title: तकनीक के गुलाम 

 

कभी गलियों में गुज़रता था बचपन,

अब मोबाइल स्क्रीन में सिमट गया है ..

 

कभी गुड़ियों के कपड़े सिया करते थे,

अब ऑनलाइन ही बाज़ार सजता है..

 

कभी कॉमिक्स में कटती थी गर्मी की दोपहर,

अब वाट्सएप्प पर चुटकलों से दिल बहलता है..

कभी कुमार सानू की कैसेट बजती थी कमरे में,

अब इंटरनेट पर ही फरमाइशी प्रोग्राम होता है..

 

कभी कॉलेज के बाहर दीवाने मचलते थे,

अब टिंडर पर ही इज़हारे इश्क होता है..

 

कभी यारों की जमती थी महफ़िल,

अब फेसबुक के सहारे दिल खुश होता है..

 

कभी कीर्तन में रमा करता था वृद्ध मन,

अब बुढ़ापा भी यूट्यूब के सहारे कटता है..

 

तकनीक ने दुनिया तो कर दी मुट्ठी में,

पर मुट्ठी से नरमी और मोहब्बत फिसल गयी..

 

वर्चुअल वर्ल्ड में हम करीब तो आ गए..

पर असल दुनिया से जुदा हो गये..

 

तकनीक ने राह तकना भुला दिया.. 

तकनीक ने धीरज बंधाना भुला दिया..

तकनीक ने प्यार जताना भुला दिया..

आंखों में आँखे डालना भूल गए..

खुशियों में शरीक होना भूल गए..

दुःख में शामिल होना भूल गए..

 

तकनीक को इंसान ने ईजाद किया,

पर इंसान खुद तकनीक का ग़ुलाम हो गया.

Poet: स्निग्धा रितेश

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