Result of Poetry Competition Fourth Edition
Category: Hindi

Title: मृग-तृष्णा

कोई नगमा, कोई किस्सा, कोई गीत सुना दो आज,

मृगतृष्णा में भटक रहा मन, राह सरल दिखला दो आज।

 

कोई सपना बिखर रहा है, कोई अपना बिछड़ रहा है,

और कहीं पर करुण हृदय वह, धीरे-धीरे सिसक रहा है।

बाग, बगीचे, तरुण लता भी, अब न मन को रिझा रही हैं,

संध्या-रजनी मधुर प्रणय भी, पाठ विरह का सिखा रही है।

मन में पैठा तम है भय का, साहस ज्योत जगा दो आज,

मृग तृष्णा में भटक रहा मन, राह सरल दिखला दो आज।

 

उषा की किरणें भी तन को, अग्नि-दाह सा तपा रही है,

कोमल, सुरभित पुष्प कली भी, श्वास-समीर को सता रही है।

कंपित पग से, क्लांत करों से, जीवन बोझ उठाना है,

चैन मिले अब मरघट में ही, अंतिम वही ठिकाना है।

जीवन-लहर में डूब रही यह, नैया पार लगा दो आज,

मृग-तृष्णा में भटक रहा मन, राह सरल दिखला दो आज।

 

भटक रहा मैं ऐसे जैसे, मृग ढूंढे कस्तूरी को,

बहुत हुआ, पर कैसे तोडूं, मैं इस जग-दस्तूरी को।

तिल-तिल, क्षण-क्षण पीड़ा क्यूँ, क्या भाग्य मेरा अभिशापि है,

मैं किससे कहूँ व्यथा मन की, यहाँ सब दुःख के सहभागी हैं।

चीख चीख अब श्रांत हो चला, कला मौन सिखला दो आज,

मृग-तृष्णा में भटक रहा मन, राह सरल दिखला दो आज।

 

किस उपवन से कलियाँ चुन लूँ, किस ईश्वर का ध्यान करूँ..?

जिसने बोए शूल राह में, क्या उनका सम्मान करूँ..?

क्या बना रहूँ बस दीन मनुज, शिथिल रहूँ, प्रहार सहूँ..?

या फिर बनकर प्रचंड शूर, दुराचार का संहार करूँ..?

व्याकुल मन के प्रश्न असंख्य, हो उत्तर-काव्य, पढा दो आज,

मृग-तृष्णा में भटक रहा मन, राह सरल दिखला दो आज।

Winner

Rajnish Kumar Sonu

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Title: प्रेम विरह 

विरह अग्नि में ज्वलित तन मन सघन वन कृष्ण मोहन

प्रेमजल बिन तड़पती मैं शुभ पवन शशि रूप पावन ।

वो नयन सागर से गहरे श्याम घन मोहन मदन तन

प्रिय तुम्हे अर्पित मेरा तन मन वचन जीवन समर्पण ।।

 

दह्यमान है मेरा पलपल श्याम हे घनश्याम मोहन

हर लिया तुमने मेरा सबकुछ नहीं अब शेष शासन ।

अश्रुरंजित नैन मेरे लड़खड़ाते अब ये चरणन

प्रिय तुम्हे अर्पित मेरा तन मन वचन जीवन समर्पण ।।

 

तुम ललित त्रिभंग नागर दासी चरंणन की हे लालन

भीगा सा तन अश्रु नयनन होश ना मेरा नहीं मन ।

आज आ मुझसे लिपट इस विरह को कर मेरे पूरन

प्रिय तुम्हे अर्पित मेरा तन मन वचनजीवन समर्पण ।।

 

राधिका! हे राधिका ! आ राधिका ! मेरी राधिका !

विरह अग्नि से ज्वलित निजधाम वृंदावन मेरा मन ,

ढूढंता तेरी सुदुर्लभ मदन लोचन तिरछि चितवन   

प्रिय तुम्हे अर्पित मेरा तन मन वचन जीवन समर्पण |

 

वंशीवादन से तुम्हे ही पुकारता मेरा सदा मन

जल रहा मै तड़पता हूं वेदना से रुदित नयनन ।

प्राण ठहरे कंठ में तुम दोगी मुझको पुनः दर्शन

प्रिय तुम्हे अर्पित मेरा तन मन वचन जीवन समर्पण ।।

 

रूप की माधुरी तुम्हारी चारु चंचल रूप स्वादन

नील पट से वो तुम्हारा लज्ज अर्ध पटाक्षेपन ।

आज रात्रि अनंत होगी प्रेममय गूंजेगा निधिवन

प्रिय तुम्हे अर्पित मेरा तन मन वचन जीवन समर्पण ।।

Runner up

Yash Kant

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Top 10 Poets (inclusive of winners)

Title: द्रौपदी

|| अग्निकुंड से जनमी, यज्ञसेनी ||

 पांडवों की अर्धांगिनी

 द्रुपदकन्या द्रौपदी

 आर्यावर्त की कल्याणी ||

 

 अरम्भ हुया खेल चौसर का,

 जब शकुनि ने प्रपंच रचाया था

 राज पाढ़ -अनुजो को हार, युधिष्ठिर;

 अखिर मे द्रौपदी को दाव पे गवाया था।

 

 कुरुवंश कुलवधु को;

 दासी बनाकर बुलवाया था

 कोइ पुछे जाकर धर्मराज से;

 ये कैसा धर्म निभाया था।

 

 केश पकड़ जब दुशासन ने,

 पांचाली को खिच कर लाया था

 सिंघासन में बैठे हर धरमवीर को,

 वचन ने बेबस बनया था।।

 

 चुप थे भीष्म ,चुप थे द्रोण

 विदुर भी लज्जित था

 जिस सभा मे अधर्म घटे,

 वोह सभा हि कलंकित था।

 

 दुर्योधन ने पांचाली को,

 अपनी जाॅघ मे बेढाना चाहा था

 तभ भी सभा मौन थी;

 आर्यावर्त में अंधेरा चाया था।

 

 कर्ण ने वैश्य कहा, 

दुर्योधन ने चीर-हरण का चाहा

 खिच खिच के थका दुशासन

 पर वस्त्र का ना अंत हुआ।

 

 श्री कृष्ण की लीला थी वो

 द्रौपदी के सम्मान को बचाया था

 उसके वस्त्र की रक्षा मे

 पुरी सभा को निर्वस्त्र करवाया था ।

 

 अपमानित हुई पंचाली के,

 मन में एक रोश था

 क्या, खेल था ये नियाती का;

 या पांडु-पुत्रो का दोश था ?

 

 युध ये प्रतिशोध का नही,

 अधर्म तो दूजा करण था

 ये जिद थी औरत के स्वाभिमान की;

 महाभारत उसिका प्रमाण था ।।

Poet: Sadaf Afrin

Title: बिखर गया बचपन

 सड़क किनारे बिखर गया बचपन

सुबह उठा तो रोज की तरह

भूख शान्त करने निकल पड़ा बचपन

कभी भूखा, कभी प्यासा, कभी अर्द्धनगन

कभी बारिश में भीग गया बचपन ।।

जाडे की उस कंपकपाती सर्दी में

बस बेवजह  ठिठुर गया बचपन

गर्मी की चिलचिलाती धूप में

नंगे पांव दौड़ गया बचपन

 और यूं ही बिखर गया बचपन।।

कचरा बीना नन्हीं  हथेलियों से

फिर भी भरपेट ना खा पाया बचपन

वो मासूमियत भरी खिलखिलाती हंसी 

भूखे पेट भूल गया बचपन

मेले की भीड़ में मिठाई की दुकान पर

 बस रोते बिलखते रह गया बचपन 

और यूं ही बिखर गया बचपन।।

कंधे पर बस्ते की जगह 

काम के बोझ तले दबता गया बचपन

 नन्हें हाथों से साफ कर कांच के गिलास

 हथेलियों की कोमल तक होता गया बचपन

 और यूं ही बिखर गया बचपन।।

अय्याशी दहशतगर्दी के माहौल में 

कभी पटरी किनारे कुचला गया बचपन तो 

कभी सड़क किनारे खून से लिपट गया बचपन

 बिना बिस्तर के एक सुकून भरे कल की आस में 

मिट्टी पर ही सो गया बचपन।।

और सुबह उठा तो रोज की तरह

 कूड़े में भविष्य तलाशने लगा बचपन 

बस यूं ही सिमट गया बचपन

 यूं ही बिखर गया बचपन 

यूं ही बिखर गया बचपन।।

Poet: Sangeeta

Title हवा और रूह

बहुत दिनो बाद 

छत पर बैठी हवा से मिला

चुप सी, शांत थी वो कब से

मुझे देखा तो मुड़ी

घुटनो के बीच रखी

गर्दन को उठा

पंजो के बल उठी 

और जा चढ़ी 

आम की चोटी

पीले, हरे पत्तों को हिला

आम झूम उठा 

पत्तियाँ, हवा की पायल बन 

छनछना उठी

खुश थी वो मुझ से मिलकर आज

वो भी कितनी अकेली थी 

गुमसुम सी, शांत सी 

अचानक कान के पास आई

आकर फुसफुसाई

कहाँ थे इतने दिन ?

चौकोर आयतो की खिड़कियों

में कैद था

घुटन बढ़ गई थी तो

तोड़कर बाहर आया हूँ आज

आज तुम बस तुम 

रहोगी आगोश में मेरे ऐ हवा 

सुनकर लिपट पड़ी हवा 

और भर गई जिस्म में 

साँसो के रास्ते 

उसे मिल गया था 

उसका बिछुड़ा साथी

मै, हाँ मै ही तो था 

हवा का आकार 

और रूह मेरी, हवा ही तो थी 

बंद घनाभों में तलाश रहा था रूह

पर वो तो आजाद है 

सूरज की किरणों के  

कूदते कणों सी 

जा रही हो क्या ?

रुक सी गई है साँस

मत जाओ ऐ हवा !

अब तुम हो 

तुम ही तो मरे साथ हो

खनखनाती टहनी के पीछे से आई 

और सींक से कान में गुदगुदाई

आ गई मै, पर अब न जाना 

पिछली बार की तरह 

ना-ना, कभी ना कहकर 

लिपट गया बेआकार हवा से 

और मिलाकर रूह से उसे 

जिंदा कर दिया 

घुटी सी रूह को

हवा और मेरी रूह एक ही है 

दिखती चाहे कितनी भी अलग हो

पर एक है, हाँ एक ही तो है

हवा और रूह॥

Poet: Bhagat Singh 

Title: दो अमर प्रेम...

 

एक की चाहत, एक की आराधना थी,

कान्हा पे मर मिटनेवाली 

एक राधा और एक मीरा थी।

कृष्ण को कृष्ण ही रहने दिया

ये उन्मुक्त प्रेमवाली राधा थी,

कृष्ण को आराध्य बना दिया 

ये उपासना में लीन मीरा थी।

वो मोहोब्बत की दिवानी थी

ये इश्क की इबादत थी,

वो चाह थी, ये चाहती थी

फिर भी जो जीती वो रुक्मिणी थी,

शाम की इस प्रेमकहानी की 

वो राधा थी, ये मीरा थी।

कुछ पल साथ पाके भी 

वो माधव की अभागन कहलाई,

रात दिन बस नाम रठके

ये मोहन की पुजारन कहलाई,

इस संसार ने जो ठुकराई 

वो राधा और ये मीरा थी।

उसने प्रीत को पती माना

तो जग ने अपवित्र कहा,

इसने परमेश्वर को पती माना

तो जग ने पागल कहा,

फिर भी चंद रसमों को लांधकर

जिन्होंने प्रेम को अपनाया,

वो राधा और ये मीरा थी।

कृष्ण मन में राधा की छबी थी,

मीरा चरणों में ही खुश थी,

वो जी जान से चहानेवाली थी

ये विष का प्याला पिनेवाली थी।

ऐसी कृष्ण की,

एक प्रेयसी थी, एक अस्सीम भक्त थी,

कान्हा पे मर मिटनेवाली 

एक राधा और एक मीरा थी।

Poet: Pooja Chaugale

Title: बता मुझे मैं क्या लिखूँ

तू लिखूँ मैं लिखूँ, बता मुझे मैं क्या लिखूँ?

प्रेम की ज्योति लिखूँ, या चक्षु के मोती लिखूँ,

भोर का दीपक लिखूँ, या साँझ आरती लिखूँ,

बता मुझे मैं क्या लिखूँ,

कौन सी मात्रा लिखूँ, कौन सी बिंदु लिखूँ,

मीरा की भक्ति लिखूँ, या सीता की शक्ति लिखूँ,

बता मुझे मैं क्या लिखूँ,

श्रृंगार स्त्री का लिखूँ, या विरह की पीड़ा लिखूँ,

सीमा का सैनिक लिखूँ या माँ का आँचल लिखूँ,

बता मुझे मैं क्या लिखूँ,

कृष्ण की मुरली लिखूँ, भोले का तांडव लिखूँ,

शतरंज की चाल या मनुष्य मतलबी लिखूँ,

बता मुझे मैं क्या लिखूँ,

मौत का मातम लिखूँ या जीवन का परिश्रम लिखूँ,

सृष्टि को विकराल लिखूँ या समय को काल लिखूँ,

बता मुझे मैं क्या लिखूँ,

स्पर्श पर विराम लिखूँ,  विज्ञान को प्रणाम लिखूँ,

अग्नि को पूज्य या अहंकारी शमशान लिखूँ,

बता मुझे मैं क्या लिखूँ,

भ्रष्ट राजा लिखूँ या चिन्ह चुनाव के लिखूँ,

बिलखते हुए रिश्ते लिखूँ या बिखरे हुए घर लिखूँ,

बता मुझे मैं क्या लिखूँ,

हारा हुआ मन लिखूँ, आत्मसमर्पण लिखूँ,

उम्मीद के क्षण लिखूँ, कैसे मैं ये पल लिखूँ,

बता मुझे मैं क्या लिखूँ,

रण की भूमि लिखूँ या भूमि को रण लिखूँ,

इस प्रकोपी रोग को कौन सा दंगल लिखूँ

बता मुझे मैं क्या लिखूँ,

किसके सन्दर्भ में लिखूँ, किसके आदर में लिखूँ,

हो गयी हूँ शून्य मैं अब बता मैं क्या लिखूँ

Poet: Khanak Chauhan

Title:  कर्ण की गाथा

मैं कर्ण आज सुनाता अपनी गाथा हूं,

कुछ अपने बारे में मैं तुम्हें बताता हूं।

सूरज की रोशनी बन कर मैं इस दुनिया में आया था,

पर अपनी मां के जीवन पर अंधकार जैसा छाया था।

न चाहते हुए भी मेरी मैया ने मुझे खुद से दूर किया,

दुनिया क्या कहेगी इस डर ने उसे मजबूर किया।

अपनी जननी से दूर हों कर मैंने मां की ममता को पाया,

जिसे बनना था महलों का राजकुमार वो सूत पुत्र कहलाया।

मेरे मन में केवल अर्जुन को हराने का सपना था,

तब मैं नहीं जानता था कि वो तो मेरा अपना था।

मेरी प्रतिभा देख कौरव कुमार ने मुझे एक महाराज बनाया,

एक सूत पुत्र को गले लगा कर उसने अंगराज बनाया।

द्रौपदी के साथ हों रहें अन्याय पर मैं आंख खोल कर सोया था,

इस महाभारत के युद्ध का बीज उस दिन मैंने भी बोया था।

सच कहूं तो मैं इस युद्ध में उस दिन अपनी आत्मा को हारा था,

जब अपने इन हाथों से मैंने अपने भाइयों के बच्चों को मारा था।

मेरी मृत्यु ना बुद्धि से हुईं और ना ही किसी के बाहुबल से,

रथ के पहिये को निकालता मारा गया मैं और वो भी छल से !

मैं अभागा कितना कि मुझे अपने ही भाई के हाथों मौत मिली,

लेकिन मरने के बाद ही सही पर मुझे मेरी मैया की गोद मिली।

मैं कर्ण आज सबको सुनाता अपनी गाथा हूं,

नारी का सम्मान करो बस यहीं समझाता हूं।

Poet: Manmohan Pandey

Title: न में नर हूं, न में नारी

खुदको छुपाकर रखो हमेशा

बात मुझे माँ  बतलाती थी ;

 नकाब रहे व्यवहार पे मेरे

बात ये उसे सताती थी ;

सही गलत क्या समझाती थी

प्यार भी मुझसे बेशुमार करती थी ;

फिर भी न जाने क्यों माँ मेरी 

सच्चाई से  डरती थी  ।

 

न में शिव हूँ न में शक्ति,

उस ईश्वर की मैं  निमित्त थी,

वजूद मेरा भी अधिकार मेरा भी

मैं दृढ़ विश्वास व सहमत थी ।

 

अर्ध नारीश्वर रूप प्रभु का 

या विष्णु जी की माया कहो ;

किन्नर हूँ तो क्यों समाज में

आजीवन मेरी निंदा हो 

  

क्या में बस एक अभिशाप हूँ

 नापाक हूँ क्या  क्या एक पाप हूँ ;

 

खुद को खुद में हूँ  तलाशती 

 कभी सवरती,कभी निखरती

कभी भावनाओ में यूँ बिखरती   

लज्जा से सिहरती, फिर क्यों हूँ अलगसी?

 

 में तारा हूँ,  इस आसमान का 

फिर क्यों  चरित्र पर मेरे अंधकार ये

 क्यों ये घुटना, क्यों ये सहना

क्यों है ऐसा तिरस्कार ये!

 

यौवन ने जब छुआ मुझे था 

कुछ बदलाव तो हुआ मुझे था,

खुद के घर से तिरस्कार फिर 

दूषित हास्यास्पद अखियों से घिर 

प्रियजनो ने मुझे ठोकर मारी 

कहो न कैसे हूँ मैं अस्थिर ।

 

है समाज ये प्रश्न है तुमसे 

क्या रक्त से मूल्य है वस्त्र का ज़्यादा 

तुमसा ही हूँ मैं मांस का पुतला 

फिर क्यों मुझसे ऐसा इरादा !!

‌फिर क्यों मुझसे ऐसा इरादा !!

Poet: Sanya Tikarya 

Title: तू दूर चल बस कहीं

तू दूर चल बस कहीं

क्षितिज के किनारों में, 

जहाँ अमर रहे ये प्यार मेरा, 

जैसे ताज के मीनारों में। 

 

जहाँ ज़र्रा ज़र्रा चलता हो, 

मोहब्बत के इशारों में, 

जहाँ हर फ़िज़ा ही ऐसी हो, 

जैसे सावन के बहारों में। 

 

तू दूर चल बस कहीं, 

सपनों के आशियाने में, 

कि समझ सके ये इश्क मेरा, 

वो हुनर कहाँ ज़माने में। 

 

जहाँ कर सकूँ मैं कोशिश, 

तुझे थोड़ा सा हँसाने में, 

जहाँ हक़ीक़त का कोई ज़ोर नहीं, 

जैसे सब कुछ हो फ़साने में। 

 

तू दूर चल बस कहीं, 

ख्वाबों के घराने में, 

जहाँ सो लूँ एक प्यारी नींद, 

तू हो मेरे सिरहाने में। 

 

जहाँ जुर्रत कर सके ना कोई

हमें जुदा - जुदा कराने में, 

जहाँ ख़ुदा भी खुद कोशिश करे, 

हमें हर पल मिलाने में। 

 

तू दूर चल बस कहीं, 

तनहाई के ठिकाने में, 

जहाँ थम जाए ये वक़्त ज़रा, 

कुछ पल बिताने में। 

 

जहाँ रोक सके ना कोई, 

तुझे थोड़ा सा सताने में, 

जहाँ कर सकूँ थोड़ी हिम्मत मैं, 

तुझे अपना प्यार जताने में। 

 

तू दूर चल बस कहीं, 

ख्वाबों के सितारों में, 

जहाँ थोड़ा सा सुराख हो, 

दूरी की दीवारों में। 

 

जहाँ इश्क के बादल हो, 

आसमान के नज़ारों में, 

जहाँ हर रोज़ माँगूँ तुझे, 

मंदिर और मज़ारों में। 

Poet: Ameya Aanand

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